आज भारतीय रुपया जब डॉलर के मुकाबले कमजोर दिखता है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर 100 साल पहले वही रुपया 10 अमेरिकी डॉलर के बराबर कैसे था और आज उसकी स्थिति क्यों बदल गई?
इस सवाल का जवाब भावनाओं में नहीं, बल्कि इतिहास, वैश्विक अर्थव्यवस्था और नीतिगत फैसलों में छिपा है।
📜 इतिहास की सच्चाई
20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय रुपया चांदी (Silver Standard) पर आधारित था, जबकि अमेरिकी डॉलर सोने (Gold Standard) से जुड़ा था। उस समय चांदी की वैश्विक कीमत अधिक होने के कारण रुपया बेहद मजबूत माना जाता था।
🌍 वैश्विक शक्ति संतुलन का बदलाव
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक और सैन्य रूप से सबसे बड़ी ताकत बन गया। डॉलर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रिज़र्व करेंसी बना दिया गया, जिससे पूरी दुनिया डॉलर पर निर्भर हो गई — और यहीं से रुपये पर दबाव बढ़ता चला गया।
📉 अवमूल्यन और आर्थिक संकट
1966 और फिर 1991 में भारत को गंभीर आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा। विदेशी मुद्रा भंडार घटा, आयात बढ़ा और सरकार को रुपये का अवमूल्यन करना पड़ा। इसका असर आज तक देखने को मिलता है।
🛢️ आयात आधारित अर्थव्यवस्था
भारत आज भी कच्चे तेल, रक्षा उपकरण और उन्नत तकनीक के लिए भारी आयात करता है। इन सभी का भुगतान डॉलर में होता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
📊 महंगाई और विकास का अंतर
अमेरिका की तुलना में भारत में महंगाई अधिक रही है। लंबे समय में यही अंतर किसी भी मुद्रा की वास्तविक ताकत तय करता है।


